ग्रीस, रात का वक्त।
इश्क रोए जा रही थी, गुस्सा-नाराज़गी उसकी आंखों में साफ नज़र आ रहा था और अर्श चुपचाप उसे देख रहा था। उसने उसे चुप करने की कोशिश भी नहीं की। उसने अपने कदम आगे बढ़ाए और इश्क को हाथ लगाना चाहा तो इश्क दो कदम पीछे हट गई और बोली, “हाथ मत लगाना मुझे! ये हक खो चुके हो तुम मुझे हाथ लगाने का, मुझे छूने का, मेरे करीब आने का। कोई हक नहीं है तुम्हारा मेरे ऊपर, समझे तुम?”







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