
इंदौर इंडिया मध्यप्रदेश
रुध्रित के हाथ में वो कागज का टुकड़ा था जो मुक्ति छोड़कर गई थी। उसने उसे अपनी मुट्ठी में कसा हुआ था। उसके चेहरे पर गुस्सा साफ नजर आ रहा था। गुस्से की वजह से उसके फोरहेड की नसें दिखाई दे रही थीं, जो फटने को तैयार थीं और आंखों में एक अजीब सी डार्कनेस थी। मुक्ति के लिखे एक-एक लफ्ज़ उसके दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहे थे 'पैसे चुका दूंगी', 'डिजर्व करती हूं'।











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