
इंदौर, इंडिया, मध्य प्रदेश।
मुक्ति की बात सुनकर रुध्रित के एक्सप्रेशन पूरी तरह से डार्क हो चुके थे। उसकी आँखों का रंग इस वक्त गहरा लाल हो चुका था, जैसे उसके अंदर कोई ज्वालामुखी फटने को तैयार हो। मुक्ति की बातों ने तेजाब का काम किया था। रुध्रित अपना चेहरा मुक्ति के चेहरे के इतने करीब लेकर आया कि उसकी नाक मुक्ति के गाल को टच करने लगी। वो अपने दांत पीसते हुए बेहद डार्क और रफ आवाज में बोला, "लड़कियां... यू थिंक ई जस्ट वांट ए बॉडी, वाइफी? इस शहर में जिस्म दो कौड़ियों के भाव बिकते हैं, लेकिन रुध्रित वर्धन को किसी और का कचरा छूने की अब आदत नहीं है। मुझे सिर्फ तुम्हारा ये जिस्म नहीं चाहिए; मुझे तुम्हारी ये रूह, तुम्हारा ये दर्द, तुम्हारी ये चीखें, सब कुछ चाहिए... सब कुछ!"











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