
इंदौर, इंडिया, मध्य प्रदेश।
मुक्ति और रुध्रित जैसे ही वर्धन मेंशन के अंदर आए, दोनों की नज़रें सामने बैठे लोगों पर गई। सामने इस वक्त कोई और नहीं बल्कि रुध्रित का बाप समर्थ वर्धन बैठा हुआ था और इसके साथ एक औरत मौजूद थी। वो औरत कोई और नहीं बल्कि आकांक्षा थी मुक्ति की भाभी। उन दोनों को वहाँ देखकर रुध्रित एकदम से अपने दाँत पीसते हुए आगे बढ़ा और बोला, "मेरे घर में आने की हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी? तुम्हें यहाँ आने की इजाज़त किसने दे दी?" बोलते हुए वो सीधा उनके सामने आकर खड़ा हुआ। वैदेही चुपचाप दूसरी तरफ खड़ी हुई थीं, उनको भी बहुत अजीब लग रहा था।













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