
इटली, रात का वक्त। जिस तरह से आर्यांश गाड़ी ड्राइव कर रहा था, ऋद्धिया डर से कांप रही थी। आर्यांश ने उसके बोलने पर स्पीड कम नहीं की, बल्कि और ज्यादा बढ़ा दी। ऋद्धिया को ऐसा लग रहा था जैसे उसका दिल उसके सीने से बाहर निकल आएगा। उसकी आंखों से आंसू बहे जा रहे थे।
तभी आर्यांश ने अपनी गाड़ी को एकदम से एक ऐसे रास्ते पर मोड़ दिया जो पूरी तरह से सुनसान था, चारों तरफ घने-घने पेड़ थे। थोड़ी देर बाद उसने अचानक से ब्रेक लगाया, तो ऋद्धिया का सिर सीधा डैशबोर्ड से टकराया। वो अभी भी हांप रही थी। आर्यांश ने अपनी सीट बेल्ट खोली और सीधा ऋद्धिया के करीब आ गया और ऋद्धिया की आंखों में देखकर बोला, "बहुत शौक है ना तुम्हें आजादी का? आजाद होने के लिए तुम किसी भी हद तक जाने को तैयार हो ना, तो आज तुम्हें तुम्हारी आजादी मुबारक हो फ्लावर! आज की रात तुम जंगल में गुजारोगी, एक आजाद पंछी की तरह।"













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