
रोहतक, हरियाणा।
राहा, तक्षक के होठों को किसी लॉलीपॉप की तरह सक कर रहे थे और तक्षक ने उसे रिस्पांस नहीं दिया था। वो अपनी जगह पर ही खड़ा हुआ था, लेकिन हालात उसकी खराब हो रही थी अपनी महबूबा की हरकतों को देखकर। तभी उसने राहा के शोल्डर पर हाथ रखा और उसे खुद से दूर करते हुए बोला, "पहले तुम कुछ खाओगे। मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे बीच में रोको, इस बार बर्दाश्त के लिए आखिरी बार नहीं करूँगा।"
इतना बोलकर वो वहाँ से किचन की तरफ चला गया।
थोड़ी देर बाद वो खाना लेकर आया और उसने अपने हाथों से राहा को खाना खिलाया। खाने के बाद राहा अपनी जगह से खड़ी हुई और वहाँ से पीछे की तरफ भागते हुए बोली, "अब नहीं खाना मुझे! अब आप मुझे पकड़िए, उसके बाद हम रोमांस करेंगे।"
तक्षक खुद से बोला, "ये कैसी जिद है? क्या करूं मैं इसका?" बोलते हुए उसने अपने बालों को पकड़ कर खींचा और वो सीधा राहा के पीछे-पीछे बाहर की तरफ बढ़ गया। राहा इस वक्त उस लाइब्रेरी में थी जो तक्षक ने उसके लिए बनवाई थी; पूरी ग्लास से बनी हुई बेहद खूबसूरत थी वो। वो लाइब्रेरी में चली आई थी और तक्षक उसके पीछे ही था।
तक्षक पीछे से राहा को देखकर बोला, "महबूबा, बस बहुत हुआ! अब तुम चल रही हो रूम में, वरना..."


















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